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दमोह जिले के तेजगढ में विराजित है अष्‍ट भुजा गणेश की प्रतिमा जिसका इतिहास 500 वर्ष पुराना

नवलोक समाचार दमोह.
गणेश चतुर्थी से अनंत चतुदशी तक प्रथम पूज्‍य आद देवता गणेश की आरधना देश भर में की जा जाती है, सनातन संस्‍कृति में सभी देवी देवाताओ को अलग अलग स्‍थान दिया गया है, देश भर में पूजे जानेव वाले शिवपुञ गणेश के कई मंदिर है और कई अदभुत और अलौकिक प्रतिमाए भी स्‍थापित है. जिनमें एक अदभुत और अलौक‍क प्रतिमा दमोह जिले की तेंदुखेडा विकासखंद के ग्राम तेजगढ में कई वर्षो से स्‍थापित है. जिसके दर्शन लाभ के लिए दूर दूर से भक्‍त गण आते है, ऐसा कहा जाता है कि इस प्रतिमा का इ‍‍तिहास अब से 500 वर्ष पुराना है.

दमोह जिले के तेंदूखेडा ब्‍लाक के ग्राम तेजगढ में विराजित गणेश प्रतिमा की कई भुजाए है, ऐसी प्रतिमा अदभुत होने के साथ साथ कम ही देखने को मिलती है. लोगो का कहना है कि इस प्रतिमा के बारे में कोई स्‍पष्‍ट जानकारी नही है कि इसका प्रर्दुभाव कब हुआ, किसके द्वारा तेजगढ में इस प्रतिमा को स्‍थापित किया. प्रतिमा को लेकर क्षेञ के लोगो की अलग अलग मान्‍यता है.

500 वर्ष प्राचीन है प्रतिमा
तेजगढ़ में स्‍थापित इस अष्टभुजा गणेश की प्रतिमा के बारे में गांव के ही वृद्ध दामोदर सोनी, मुन्ना कोरी, राजकुमार साहू, श्याम सुंदर यादव बट्टू यादव आदि का कहना है कि यह मंदिर एतिहासिक है और प्रतिमा काफी प्राचीन है जिसकी जानकारी उन्हे भी बुजुगों से मिली है श्याम सुंदर यादव ने बताया कि 500 साल पहले ओरछा के हरदोल का जन्म हुआ था और उसी समय राजा तेजी सिंह का भी जन्म हुआ और उन्ही के राज में यह प्रतिमा स्थापित की गई. ऐसा कहा जाता है कि इस अदभुत और अलौकिक गणेश प्रतिमा को भी लोग गणेश आराधना के दिनो में पूजा करते थे, तेजगढ़ सहित आसपास के 50 गांवो में इस प्रतिमा के प्रभाव के कारण अन्‍य प्रतिमा स्‍थापित नही की जाताी थी, लेकिन समय के चलते अब पिछले 70 सालो से ग्रामीण क्षेत्रों में गणेश प्रतिमाएं स्थपित होने लगी हैं. तेजगढ के मंदिर में आज भी भगवान गणेश का पूजन पुरानी रिती रिवाज से ही किया जाता है, ग्रामीणजनो का कहना है कि तेजगढ़ मंदिर में जनवरी माह में तिल गणेश के अवसर पर मंदिर में विशेष पूजा की जाती है.

जमीन में धंसने की भी है दास्‍तां
तेजगढ के मंदिर में विराजित अष्‍टभुजा गणेश की प्रतिमा के इतिहास को लेकर तो कोई स्‍पष्‍ट जानकारी प्राप्‍त नही हो पाई लेकिन गांव के शिक्षक महेन्द्र दीक्षित ने बताया कि भगवान गणेश की स्थापना राजा तेजी सिंह ने की थी इस प्रकार की जानकारी ग्रंथों में है 80 वर्ष पहले प्रतिमा मंदिर से नीचे की ओर धसने लगी तब फतेहपुर गांव के कोई संत यहां आए थे इसके बाद प्रतिमा को बाहर निकाला गया प्रतिमा के ऊपर काफी बड़ी मात्रा में सिंदूर निकला था जिसे नर्मदा में बहाया गया था और फिर सभी के सहयोग से नए मंदिर का आकार दिया गया जो काफी विख्यात है.

कैसे पहुंचे दर्शन को . अष्टभुजा श्रीगणेश के दर्शन के लिए आपको दमोह जिले से 35 किलोमीटर का सफर तय कर तेजगढ पहुंचना होगा, जहां आपको भगवान गणेश की प्राचीन प्रतिमा के दर्शन प्रापत हो सकते है. प्रचीन मंदिर में भगवान अष्टभुजा के रूप में विराजमान है. कहा जाता है कि इस अदभुत और अलौकिक गणेश प्रतिमा के दर्शन करने और मनोकामना मांगने से जरूर पूरी होती है. कहा जाता है कि तेजगढ में भगवान गणेश की अष्टभुजा प्रतिमा अब से 500 वर्ष पूर्व जमीन के नीचे से निकली है. जिसे तेजगढ़ के राजा तेजी सिंह ने स्‍थापित कराया था, बुदेलखंड के इतिहास में राजा तेजी सिंह का नाम भी आता है, जिसके चर्चा बुदेली कथाओ में सुनने को मिलती है.

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