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न किसान पुत्र, न बेटियों का मामा, न आदिवासियों का भाई, न रोजगार, न शिक्षा, न स्वास्थ्य, न फसलों की कमाई

श्री शिवराज सिंह चैहान ने षड्यंत्र कर सबसे पहले मामा के नाम का मुखौटा लगाया, फिर खुद को किसान पुत्र बताया। फिर बने घोषणावीर, फिर आदिवासियों के भाई और टैक्स के सैकड़ों करोड़ खर्च कर कोरी प्रसिद्धी कमाई। परंतु, मामा ने जिस-जिस नाम से प्रसिद्धी कमाई, उन्हीं को धोखा दे, उनकी लुटिया डुबाई। आईये, मामाजी की करतूतों पर सिलसिलेवार सवाल खड़े किये जाएं:-
करोड़पति मामा के ‘दिये तले फैला है, गरीबी का अंधेरा’:
मामा आये दिन ‘स्वर्णिम से समृद्धि’ का झूठा ढोल पीट रहे हैं। जानिए, करोड़पति मामा के दिये तले कितनी गरीबी का अंधेरा फैला है। करोड़पति मामा जिस ‘जैत गांव’ (बुधनी) से आते हैं, वहीं गांव के 90 प्रतिशत से अधिक लोग गरीबी रेखा से नीचे रह रहे हैं। मध्यप्रदेश सरकार के ‘समग्र पोर्टल’ पर बताया गया है कि जैत गांव में कुल 327 परिवार हैं। जिनमें 258 परिवार बीपीएल (गरीबी रेखा के नीचे) नीला कार्डधारी व 36 परिवार अंत्योदय अर्थात पीला बीपीएल कार्डधारी हैं (संलग्नक ।1)। यहां तक कि मामा की बुधनी विधानसभा का ‘बकतरा सेक्टर’ (जिसमें जैत गांव भी आता है) की 32 में से 31 आंगनवाड़ियों में अभी भी बिजली नहीं है व 17 आंगनवाड़ियों में खाना पकाने के बर्तन नहीं हैं। यदि मामा के गांव व विधानसभा में ही बदहाली का यह आलम है, तो कल्पना कीजिए कि प्रांत की स्थिति क्या होगी?

‘मोदी सरकार’ ने खोली ‘मामा सरकार’ में मध्यप्रदेश के पिछड़ेपन व गरीबी की पोल:
u त्ठप् की स्टैटिकल हैंडबुक ‘2017’ के मुताबिक मध्यप्रदेश में 2,34,00,000 लोग गरीबी से जूझ रहे हैं, यानि 33 प्रतिशत।
u नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे, 2017 के मुताबिक 2006 से 2016 तक गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों में 27 प्रतिशत का इजाफा हुआ है।
u मोदी सरकार ने लोकसभा में 2 फरवरी, 2018 को बताया कि ‘वेल्थ इंडेक्स’ में मध्यप्रदेश के सिर्फ 15.8 प्रतिशत परिवार ही साधन संपन्न हैं। यानि 84 प्रतिशत आबादी साधनों के अभाव में जूझ रही है।
30,32,000 ‘लाड़लियों की लक्ष्मी’ ले भागा ‘मामा’:
शिवराज सिंह चैहान ने ‘लाड़ली लक्ष्मी योजना’ के माध्यम से ‘बेटियों का मामा’ बन खूब ढोल पीटा। यह कहा कि हर बेटी, जो 12 वीं कक्षा में जाएगी व 18 वर्ष की आयु तक शादी नहीं करेगी, उसे 1,18,000 रु. का नेशनल सेविंग सर्टिफिकेट अर्थात एनएससी मिलेगा। मगर ‘कंस मामा सरकार’ की निगाह ‘लाड़लियों’ की एनएससी में जमा लक्ष्मी पर पड़ गयी। उन्होंने दिनांक 24 दिसम्बर, 2014 को अपनी कैबिनेट में यह षड्यंत्र किया कि अब एनएससी सर्टिफिकेट की बजाय ‘कागजी प्रमाण-पत्र’ जारी किया जायेगा (संलग्नक ।2)। इतना ही नहीं पूर्व में जारी किये गये सारे एनएससी सर्टिफिकेट आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के माध्यम से वापिस लेकर लाड़लियों की जमा लगभग 5,000 करोड़ की निधि पर डाका डाल दिया और उन्हें कागज के टुकड़े थमा दिये गये। यह धोखा प्रदेश की 30,32,000 ‘भांजियों’ से कंस मामा ने किया।
भांजे-भांजियों के जीवन में भरा अशिक्षा का अंधकार, ऐसी रही मामा सरकार:-
‘मोदी और मामा’ की जोड़ी ने मध्यप्रदेश के नौनिहालों के साथ बहुत बड़ा धोखा किया। सबसे पहले तो मोदी सरकार ने मध्यप्रदेश के शिक्षा बजट पर कैंची चलाना शुरू कर दिया।
मोदी सरकार द्वारा सर्वशिक्षा अभियान में मध्यप्रदेश को दिया पैसा (करोड़ रु. में)
साल मंजूर किए जारी किए कटौती
2015-16 2763.80 1601.97 1161.83
2016-17 3133.89 1544.55 1589.34
यानि मोदी सरकार ने सर्वशिक्षा अभियान के मध्यप्रदेश के 2,751 करोड़ रु. ही डकार लिए तथा बच्चों को वंचित कर दिया।
मामा सरकार का तो हाल और भी बुरा है:-
ऽ प्रदेश के 72 प्रतिशत स्कूलों में बिजली कनेक्शन नहीं। मध्यप्रदेश के 85 प्रतिशत स्कूलों में कंप्यूटर नहीं है। (स्रोत: म्कनबंजपवद क्मअमसवचउमदज प्दकमगए ळव्प्ए 2016.17ए भ्त्क् डपदपेजतल)
ऽ 63,851 शिक्षकों के पद खाली हैं। साल 2011-16 के बीच शिक्षा बजट का 7,284 करोड़ खर्च ही नहीं किया गया। ;ब्।ळ त्मचवतजए 2017द्ध
ऽ फंड कटौती की वजह से केवल एक अध्यापक वाले स्कूल 2015-16 में 18,915 से बढ़कर 2016-17 में 19,132 हो गए। एक अध्यापक से स्कूल कैसे चल पाएगा।
ऽ 2010-16 के बीच स्कूली बच्चों को 42,88,000 किताबें बांटी ही नहीं गईं (ब्।ळ त्मचवतज 2017)
ऽ 2010-16 के बीच 42,46,000 बच्चों ने आठवीं कक्षा के बाद पढ़ना ही छोड़ दिया। (ब्।ळ त्मचवतज 2017)
शिवराज ने बनकर भाई-आदिवासियों के घर रौंदने की पृथा निभाई
केंद्र की कांग्रेस सरकार ने 2006 में 10 करोड़ आदिवासियों को वनों में जल, जंगल और जमीन का अधिकार दिया। देश में सबसे ज्यादा आदिवासी मध्यप्रदेश में हैं। मध्यप्रदेश में 6,63,424 आदिवासी परिवारों ने वन पट्टे के लिए मामा सरकार को आवेदन किया। मामा ने निर्दयतापूर्वक 3,63,424 परिवारों के आवेदन को खारिज कर दिया। अर्थात लगभग 18 लाख आदिवासियों के सपनो को चकनाचूर कर दिया।
मामा सरकार आदिवासियों के विकास के बजट पर भी कुठाराघात कर रही है। मध्यप्रदेश में 21 प्रतिशत आदिवासी हैं, जिसमंे उनके बजट की हिस्सेदारी को 21 प्रतिशत से घटाकर 2016-17 में मात्र 14 प्रतिशत कर दिया। इससे भी शर्मनाक बात यह है कि आदिवासियों के तथाकथित भाई शिवराजसिंह ने 16 लाख आदिवासियों को कैंसर युक्त जूते वितरित कर भ्रष्टाचार किया।
न फसल की कीमत, न कर्जमाफ – शिवराज सरकार का होगा सूपड़ा साफ
शिवराज सिंह पूरे प्रदेश के एक मात्र ऐसे तथाकथित किसान पुत्र हैं जो कभी फसल बेंचने के लिए मंडी की कतारों में नहीं देखे गये। आज जब हम पत्रकार वार्ता कर रहे हैं तब मंदसौर में हजारों किसान अपनी प्याज और लहसुन 50 पैसे किलो में बेचने के लिए मजबूर हैं। वो आत्महत्या करने की बात मीडिया के सामने कर रहे हैं। नागरी गांव से आये किसान अनिल सोनी मीडिया को कहते हैं कि ‘‘एक आम इंसान उस तरह नहीं मरना चाहता, जैसे 2017 में किसान मरे थे, लेकिन हम कर भी क्या सकते हैं? एक तरफ तो सरकार हमें अन्नदाता कहती है और दूसरी तरफ जूता मारती रहती है। मैं कांगे्रस को वोट दूंगा क्योंकि इस बार बदलाव जरूरी है।’’
28 नवम्बर को ‘ढपोरशंखी और ढिंढोरची’ मामा का भोपूं बजना बंद हो जायेगा और मध्यप्रदेश का विकास कांगे्रस के साथ स्वरवद्ध हो जाएगा।

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